क्यूँ मुझ से ख़फ़ा हो अब तक तुम | अब भूल भी जाओ जाने दो / Kyun Mujh Se Khafa Ho Ab Tak Tum | Ab Bhool Bhi Jao Jane Do
क्यूँ मुझ से ख़फ़ा हो अब तक तुम, अब भूल भी जाओ जाने दो क्यूँ माज़ी की यादों में हो गुम, अब भूल भी जाओ जाने दो ये मेरी दु'आ है कि फिर से एहसास-ए-मुरव्वत हो जाए हम दोनों में रब ही की ख़ातिर यूँ फिर से मोहब्बत हो जाए माज़ी को भुला कर दोनों में फिर दिल से मवद्दत हो जाए दिल साफ़ करो तुम भी अपना, अब मान भी जाओ जाने दो माज़ी के दरीचों से यादें हम को भी सताती रहती हैं वो अपनी लड़ाई की बातें, सब याद भी आती रहती हैं आँखों में हमारी वो बातें, यूँ अश्क भी लाती रहती हैं झगड़ों को भुला कर आ जाओ, बातें न बढ़ाओ जाने दो वो वक़्त भी कैसा अच्छा था, जब साथ निभाया करते थे अल्लाह के रस्ते में हम तुम, यूँ साथ ही जाया करते थे यूँ दीन की मेहनत में हर-जा, हक़ बात सुनाया करते थे आओ कि चलें उस रस्ते पर, नाराज़ी मिटाओ जाने दो रूठे को मनाना अच्छा है ये मैं ने सिफ़ारिश कर दी है अब देर तुम्हारी जानिब है, मैं ने तो गुज़ारिश कर दी है इक तुझ को मनाने की ख़ातिर अश'आर की बारिश कर दी है 'अर्ज़ी है मेरी दिल से प्यारी, अब हँस के दिखाओ जाने दो मैं तुम को मनाने आया हूँ, तुम देर न करना आने में तुम मा'फ़ करो जो...